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AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case

AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case: सऊदी अरब से आए शव को एम्स जोधपुर ने मोर्चरी में रखने से किया इंकार, पूरी रात शव के साथ धरने पर बैठे परिजन

जोधपुर, संवाददाता: कपिल सांखला

 

AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case एक ऐसा मामला बनकर सामने आया है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब से भारत लाए गए एक प्रवासी श्रमिक के शव को एम्स जोधपुर प्रशासन ने मोर्चरी में रखने से इंकार कर दिया, जिसके बाद परिजन मजबूरन शव के साथ धरने पर बैठ गए। यह मामला केवल एक परिवार के दुख तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि आपात परिस्थितियों में आम नागरिक को सरकारी संस्थानों से किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

 

सऊदी अरब में मौत और भारत लाया गया शव 

AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case की शुरुआत बालोतरा जिले के गिड़ा निवासी रमेश कुमार मेघवाल की सऊदी अरब में हुई मौत से होती है। रमेश रोजगार के सिलसिले में सऊदी अरब में कार्यरत थे, जहां उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। परिवार ने सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी कर गुरुवार को उनका शव भारत मंगवाया, ताकि अंतिम संस्कार से पहले पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया पूरी की जा सके।

 

पोस्टमॉर्टम के लिए जोधपुर एम्स पहुंचा परिवार 

रमेश कुमार मेघवाल के परिजन पोस्टमॉर्टम के लिए शव को जोधपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS Jodhpur) लेकर पहुंचे। परिवार की मंशा थी कि एक बड़े केंद्रीय संस्थान में पोस्टमॉर्टम हो, जिससे किसी भी तरह की शंका या कानूनी अड़चन न रहे।

 

एम्स प्रशासन द्वारा मोर्चरी में रखने से इंकार 

एम्स जोधपुर पहुंचने के बाद प्रशासन ने शव को मोर्चरी में रखने और पोस्टमॉर्टम करने से साफ इंकार कर दिया। यह सुनकर परिजन स्तब्ध रह गए। एम्स प्रशासन का यह रवैया AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद पहलू बन गया, क्योंकि शव विदेश से आया था और तत्काल संरक्षण की आवश्यकता थी।

 

पूरी रात शव के साथ संघर्ष करता परिवार

रमेश के भाई गैनाराम ने बताया कि वे गुरुवार पूरी रात एम्स अस्पताल परिसर में अपने छोटे भाई की डेडबॉडी के साथ बैठे रहे। उन्होंने बार-बार एम्स प्रशासन से शव को मोर्चरी में रखने की गुहार लगाई, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case में यह दृश्य बेहद पीड़ादायक रहा, जहां शोकग्रस्त परिवार रातभर शव के पास बैठा रहा और व्यवस्था से न्याय की उम्मीद करता रहा।

 

थानाधिकारी का पत्र और फिर भी अस्वीकार 

परिजनों के अनुसार, पहले एम्स प्रशासन ने कहा कि शव को मोर्चरी में रखने के लिए संबंधित थानाधिकारी का पत्र आवश्यक है। इसके बाद गिड़ा थानाधिकारी द्वारा एम्स प्रशासन के नाम पत्र भेजा गया। इसके बावजूद भी एम्स प्रशासन ने शव को मोर्चरी में रखने से मना कर दिया। AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case में यह सवाल सबसे बड़ा है कि जब सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं, तब भी इंकार क्यों किया गया।

 

पुलिस और एडीसीपी की मौजूदगी 

एम्स संस्थान पुलिस चौकी पर रात्रि में तैनात कॉन्स्टेबल हंसराज ने भी गिड़ा थानाधिकारी का पत्र एम्स प्रशासन को दिखाया और शव को मोर्चरी में रखने की बात कही। मामले की गंभीरता को देखते हुए कमिश्नरेट मुख्यालय के एडीसीपी सुनील कुमार पंवार और बासनी थानाधिकारी स्वयं एम्स संस्थान पहुंचे और ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों से शव मोर्चरी में रखने को कहा।

 

एम्स डॉक्टरों का तर्क और सवाल

AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case में एम्स के डॉक्टरों ने तर्क दिया कि यह भारत सरकार का संस्थान है और पीड़ित परिवार राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य शहर के अस्पताल या संबंधित स्थान पर शव ले जाकर पोस्टमॉर्टम करवा सकता है। यह तर्क न केवल परिजनों को असहाय छोड़ गया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या केंद्रीय संस्थानों की जिम्मेदारी ऐसे मामलों में सीमित हो जाती है।

 

मानवता बनाम व्यवस्था का टकराव 

AIIMS Jodhpur Mortuary Refusal Case मानवता और व्यवस्था के टकराव का प्रतीक बन गया है। एक ओर कानून, नियम और अधिकार क्षेत्र का हवाला दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एक परिवार अपने मृत सदस्य के शव को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है।

 

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