मुंबई | भारतीय रुपया 1 दिसंबर को इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान रुपया 34 पैसे टूटकर 89.79 प्रति डॉलर पर पहुंचा, जो दो हफ्ते पहले दर्ज 89.66 के पिछले रिकॉर्ड लो से भी नीचे है। यह तेज गिरावट घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी, विदेशी निवेशकों की भारी निकासी और डॉलर की वैश्विक मजबूती के कारण देखने को मिली। सुबह ट्रेडिंग की शुरुआत 89.45 प्रति डॉलर पर हुई थी, जबकि इससे पिछले दिन भी रुपया 9 पैसे गिरा था। लगातार कमजोरी के चलते करेंसी मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है।
साल 2025 में अब तक 4.77% कमजोर हुआ रुपया
इस वर्ष की शुरुआत से ही भारतीय मुद्रा दबाव में है। 1 जनवरी 2025 को रुपया 85.70 पर ट्रेड कर रहा था, जबकि अब यह 89.79 तक गिर चुका है। इस गिरावट का सीधा असर विदेश यात्रा, विदेश में पढ़ाई, इम्पोर्ट और अंतरराष्ट्रीय भुगतान पर पड़ता है, क्योंकि इन सभी में डॉलर की जरूरत होती है। जब डॉलर महंगा होता है, तो विदेशी सेवाओं, फीस, तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने जैसी चीजों की कीमतें बढ़ जाती हैं। उदाहरण के तौर पर, पहले जहां एक डॉलर पाने के लिए 50 रुपये खर्च करने पड़ते थे, अब उसी डॉलर के लिए 89.79 रुपये देने पड़ रहे हैं। इससे भारतीयों का विदेशी खर्च काफी बढ़ जाएगा।

डॉलर क्यों हो रहा है मजबूत और रुपया कमजोर
रुपये की गिरावट कई वैश्विक और घरेलू कारणों से जुड़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर इंडेक्स 0.04% बढ़कर 99.50 पर पहुंच गया, जिससे दुनिया की बाकी करेंसियों की तुलना में डॉलर और मजबूत हो गया। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल ने स्थिति और खराब कर दी। ब्रेंट क्रूड 1.96% की तेजी के साथ 63.60 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था, जिससे भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़े और रुपया कमजोर हुआ।
इसी समय विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। हाई वैल्यूएशन के कारण कंपनियों में उनकी हिस्सेदारी बिक रही है, जिसके चलते देश से डॉलर बाहर जा रहा है। इससे रुपये पर और दबाव बढ़ता जा रहा है। इम्पोर्टर्स, ऑयल कंपनियों, गोल्ड ट्रेडर्स और सरकारी भुगतान की डॉलर मांग भी अचानक बढ़ गई है। वहीं, अमेरिका के साथ ट्रेड टेंशन के कारण भी करेंसी बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा नए टैरिफ लगाए जाने से बातचीत धीमी पड़ गई है।
सरकार और विशेषज्ञों का क्या कहना है
कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने उम्मीद जताई है कि वर्ष 2025 के अंत तक भारत-अमेरिका के बीच एक नए ट्रेड फ्रेमवर्क पर सहमति बन सकती है, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स को टैरिफ में राहत मिलेगी और रुपये को कुछ मजबूती मिल सकती है। दूसरी ओर, बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल रुपये पर दबाव बना रहेगा, क्योंकि विदेशी फंड निकासी, महंगे क्रूड और डॉलर की बढ़त जैसी स्थितियां जल्दी खत्म होती नहीं दिख रहीं। हालांकि, ट्रेड डील अगर आगे बढ़ती है तो स्थिति स्थिर हो सकती है।
शेयर बाजार पर भी दिखा गिरावट का असर
रुपये की कमजोरी का सीधा प्रभाव घरेलू शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। सेंसेक्स 64 अंकों की गिरावट के साथ 85,641.90 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 27 अंक टूटकर 26,175.75 पर बंद हुआ। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और ग्लोबल मार्केट के दबाव के कारण भारतीय बाजारों में नकारात्मक भावना बनी रही।

करेंसी की कीमत कैसे तय होती है
हर देश के पास एक विदेशी मुद्रा भंडार होता है, जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए किया जाता है। जब किसी देश के फॉरेन रिजर्व में डॉलर अधिक होते हैं, तो उस देश की करेंसी मजबूत होती है। लेकिन जैसे-जैसे डॉलर की मात्रा घटती है, करेंसी की कीमत गिरने लगती है। फॉरेन रिजर्व, डॉलर की मांग, व्यापार संतुलन और वैश्विक आर्थिक हालात मिलकर यह तय करते हैं कि किसी करेंसी की वैल्यू क्या होगी। भारत में भी यही फ्लोटिंग रेट सिस्टम लागू है, जिसमें करेंसी का भाव बाजार तय करता है।






