जोधपुर , संवाददाता: कपिल सांखला
जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट उत्तर पश्चिम रेलवे की एक नई और दूरदर्शी पहल है, जिसके तहत अब ट्रेनों के बायो-टॉयलेट में उपयोग होने वाला बायो-डाइजेस्टर बैक्टीरिया जोधपुर में ही तैयार किया जाएगा। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि रेलवे की आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। अब तक यह बैक्टीरिया दिल्ली की एक निजी फर्म से खरीदा जाता था, लेकिन नए प्लांट के शुरू होने से जोधपुर मंडल अपने सभी कोच डिपो की जरूरतें स्थानीय स्तर पर पूरी कर सकेगा।
स्वच्छ भारत मिशन में रेलवे का नया कदम
जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट स्वच्छ भारत मिशन को मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। रेलवे द्वारा बायो-टॉयलेट प्रणाली लागू किए जाने के बाद स्टेशनों और पटरियों पर गंदगी में भारी कमी आई है। यह प्लांट न सिर्फ सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाएगा, बल्कि रेलवे आधुनिकीकरण की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा।
डीआरडीओ तकनीक पर आधारित बायो-टॉयलेट सिस्टम
जोधपुर डीआरएम अनुराग त्रिपाठी के अनुसार, ट्रेनों में लगी बायो-टॉयलेट प्रणाली रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक मूल रूप से सियाचिन जैसे अत्यधिक ठंडे और दुर्गम क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए विकसित की गई थी। इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाला एनारोबिक बैक्टीरिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में भी सक्रिय रहता है, जो इसे रेलवे कोचों के लिए बेहद उपयोगी बनाता है।
बायो-डाइजेस्टर बैक्टीरिया कैसे करता है काम
जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट में बनने वाला बैक्टीरिया बायो-टॉयलेट टैंक में मानव अपशिष्ट को विघटित करता है। यह बैक्टीरिया ह्यूमन वेस्ट को खाकर उसे पानी और गैस में बदल देता है। उत्पन्न गैस वातावरण में सुरक्षित रूप से निकल जाती है, जबकि पानी को क्लोरीनेशन के बाद पटरियों पर छोड़ा जाता है। यह पानी नदी के पानी जैसा सुरक्षित होता है और किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलाता।
दिल्ली पर निर्भरता खत्म करेगा जोधपुर प्लांट
मुख्य कारखाना प्रबंधक रवि मीणा ने बताया कि अब तक बैक्टीरिया कल्चर दिल्ली से मंगवाया जा रहा था, जिससे खर्च भी बढ़ता था और सप्लाई पर निर्भरता बनी रहती थी। जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट की मंजूरी मिलते ही यह निर्भरता खत्म हो जाएगी और सभी कोच डिपो को नियमित सप्लाई यहीं से मिलने लगेगी।
पटरियों की जंग कैसे होगी खत्म
पहले ट्रेनों से सीधे गिरने वाले मानव अपशिष्ट के कारण रेलवे पटरियों में जंग लगने की गंभीर समस्या होती थी। इससे पटरियों की उम्र कम हो जाती थी और रेलवे को उन्हें बदलने में करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते थे। बायो-टॉयलेट सिस्टम और जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए पटरियां अब जंग से मुक्त रहेंगी, जिससे रखरखाव लागत में भारी कमी आएगी।
ग्रीन कॉरिडोर और पर्यावरण संरक्षण
बाड़मेर–मुनाबाओ और पीपाड़ रोड–बिलाड़ा जैसे सेक्शन पहले ही ग्रीन कॉरिडोर घोषित किए जा चुके हैं, जहां पटरियों पर गंदगी नहीं गिरती। जोधपुर रेलवे वर्कशॉप बैक्टीरिया ट्रीटमेंट प्लांट के शुरू होने से ऐसे ग्रीन कॉरिडोर की संख्या और बढ़ेगी, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
यात्रियों के लिए रेलवे की अहम अपील
डीआरएम अनुराग त्रिपाठी ने यात्रियों से विशेष अपील की है कि वे बायो-टॉयलेट के पैन में प्लास्टिक बोतल, कपड़े, नैपकिन या गुटखा पाउच न डालें। ये वस्तुएं बैक्टीरिया द्वारा नष्ट नहीं होतीं, जिससे टॉयलेट चोक हो सकता है और पूरी प्रणाली ठप पड़ने का खतरा रहता है। यात्रियों का सहयोग इस व्यवस्था की सफलता के लिए बेहद जरूरी है।
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