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“सीमांचल में आज अगर चूक गए ओवैसी, तो AIMIM की मुस्लिम सियासत पर लग सकता है ‘फुल स्टॉप’!”

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण की वोटिंग के दौरान सीमांचल का इलाका सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। यही वह इलाका है जिसने 2020 के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM को बिहार की सियासत में पहचान दिलाई थी। लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। सीमांचल की चार प्रमुख सीटें — किशनगंज, अररिया, कटिहार और पुर्णिया — AIMIM के लिए चुनौती बन गई हैं।

 

तीन धुरंधरों की टक्कर – तेजस्वी, नीतीश और ओवैसी

इस बार सीमांचल का चुनाव मुकाबला त्रिकोणीय बन चुका है।एक ओर हैं तेजस्वी यादव, जो युवाओं और रोजगार के मुद्दे को लेकर जनता से जुड़ रहे हैं।दूसरी ओर नीतीश कुमार, जो स्थिरता और विकास के नाम पर वोट मांग रहे हैं।और तीसरी तरफ हैं असदुद्दीन ओवैसी, जिनकी पार्टी AIMIM मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ रखने की कोशिश में जुटी है।लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम मतदाता इस बार भी AIMIM पर भरोसा करेंगे या RJD की ओर झुकेंगे?

 

AIMIM की पिछली जीत, अब चुनौती में तब्दील

2020 के चुनाव में AIMIM ने सीमांचल की 5 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था।पर अब समीकरण बदल चुके हैं।RJD ने इस बार सीमांचल में अपने मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण को फिर सक्रिय कर दिया है।कई इलाकों में AIMIM के वोटर अब RJD की ओर झुकते दिख रहे हैं।इसलिए ओवैसी के लिए यह चुनाव सिर्फ सीटें जीतने का नहीं, बल्कि अपनी सियासी पकड़ बचाने का भी सवाल बन गया है।

 

ओवैसी का पलटवार – “मुसलमानों को वोट बैंक मत समझो”

ओवैसी ने रैलियों में साफ कहा है कि महागठबंधन और NDA दोनों ही मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझते हैं।उन्होंने कहा — “हम भीख नहीं मांगते, हक की सियासत करते हैं।”AIMIM का मकसद मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करना है।ओवैसी यह भी कह चुके हैं कि उनकी पार्टी किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि समान अधिकारों की लड़ाई लड़ रही है

 

स्थानीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि सीमांचल के कई इलाकों में RJD की पकड़ अभी भी मजबूत है।मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर तेजस्वी यादव के साथ खड़े दिख रहे हैं।वहीं, AIMIM का प्रभाव कुछ खास इलाकों तक सीमित रह गया है।हालांकि किशनगंज और पुर्णिया में AIMIM उम्मीदवारों की टक्कर अब भी कांटे की बनी हुई है।

 

राजनीतिक विश्लेषण – AIMIM के लिए करो या मरो की स्थिति

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ओवैसी सीमांचल में पिछड़ गए,तो AIMIM की बिहार ही नहीं, पूरे उत्तर भारत में पकड़ कमजोर पड़ जाएगी।यह चुनाव AIMIM के लिए सिर्फ वोट का नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है।क्योंकि सीमांचल ही वह इलाका है जिसने AIMIM को जमीन दी थी,और अगर यही इलाका अब साथ छोड़ देता है, तो पार्टी की सियासत पर सवाल खड़ा हो जाएगा।आज सीमांचल का हर वोट AIMIM के भविष्य को तय करेगा।अगर ओवैसी यहां अपने वोट बैंक को बरकरार रखते हैं,तो यह चुनाव AIMIM को फिर से मजबूती दे सकता है।लेकिन अगर नतीजे विपरीत रहे,तो ओवैसी की मुस्लिम राजनीति पर सचमुच फुल स्टॉप लग सकता है।

 

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