बिहार विधानसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस ने शनिवार को दिल्ली में पहली औपचारिक समीक्षा बैठक बुलाई। यह बैठक पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई, जिसमें राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल और अजय माकन भी शामिल रहे। बैठक का उद्देश्य चुनाव नतीजों का विश्लेषण, संगठनात्मक कमजोरियों की पहचान और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा करना था। कांग्रेस अब यह समझने की कोशिश में है कि महागठबंधन होते हुए भी पार्टी को इतनी भारी हार क्यों मिली।
कांग्रेस का आरोप—चुनाव में गड़बड़ी हुई
बैठक के बाद कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी को चुनाव में कई गड़बड़ियों की जानकारी मिल रही है। उन्होंने दावा किया कि दो हफ्तों के भीतर कांग्रेस इन गड़बड़ियों के सबूत देश के सामने रखेगी। कांग्रेस ने इस बार 60 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 6 पर जीत हासिल कर पाई। वोट शेयर भी गिरकर 8.71% रह गया, जबकि 2020 में 9.6% वोट मिले थे।

अजय माकन बोले—नतीजों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं
अजय माकन ने खड़गे से मुलाकात के बाद कहा कि बिहार चुनाव के नतीजे कई स्तर पर चौंकाने वाले हैं। उनका दावा था कि कांग्रेस को 1984 के चुनाव में भी ऐसा स्ट्राइक रेट नहीं मिला था जैसा इस बार BJP को मिला। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं और प्रत्याशियों से मिली रिपोर्ट बताती है कि कई जगह गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। महागठबंधन के सभी सहयोगियों ने भी इन नतीजों को अप्रत्याशित बताया है और चुनाव प्रक्रिया की जांच की मांग की है।

महागठबंधन की हार के बड़े कारण
CM फेस और सीट बंटवारे को लेकर शुरू से ही टकराव
RJD और कांग्रेस की खींचतान चुनावी तैयारी में सबसे बड़ी बाधा साबित हुई। तेजस्वी यादव को CM फेस घोषित करने पर कांग्रेस और RJD के बीच पहले सहमति नहीं बन सकी। बाद में कांग्रेस तैयार हुई, लेकिन तब तक यह संदेश जा चुका था कि महागठबंधन अंदरूनी विवादों से जूझ रहा है। इसका असर सीट बंटवारे से लेकर प्रचार तक दिखा।
नामांकन की आखिरी तारीख तक सीटें तय नहीं
पहले चरण के नामांकन की अंतिम तारीख तक महागठबंधन सीटों को लेकर उलझा रहा। यही वजह रही कि प्रत्याशियों को नॉमिनेशन कराना पड़ा, लेकिन सीटें किस पार्टी के हिस्से में जाएंगी—यह स्पष्ट नहीं था। इससे संगठन स्तर पर अव्यवस्था और कार्यकर्ताओं में भ्रम फैल गया। अंत में RJD 146, कांग्रेस 59, VIP 13, CPI-ML 20, CPI 7, CPM 4 और IIP 2 सीटों पर लड़ी। कई जगह महागठबंधन ने निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन दिया।
9 सीटों पर महागठबंधन ने खुद अपने वोट काटे
असहमति के कारण महागठबंधन की पार्टियों ने 9 सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए। इसका सीधा फायदा NDA को मिला। कई सीटों पर महागठबंधन उम्मीदवारों के संयुक्त वोट BJP/JDU से ज्यादा थे, लेकिन वोट बंटने से हार मिली। उदाहरण के लिए—
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बछवाड़ा: कांग्रेस + CPI के वोट मिलाकर भी BJP से अधिक थे
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बिहार शरीफ, राजापाकर, वैशाली, सिकंदरा, कहलगांव, सुल्तानगंज सहित 9 सीटों पर यही स्थिति रही

वादों और मुद्दों का असर नहीं दिखा
महागठबंधन ने SIR, वोट चोरी, बेरोजगारी और नीतीश कुमार की सेहत को मुद्दा बनाया। वोटर अधिकार यात्रा में भीड़ तो जुटी, लेकिन वोट में नहीं बदली। तेजस्वी पूरे समय सक्रिय रहे, लेकिन राहुल गांधी प्रचार के दूसरे चरण में कम दिखाई दिए। तेजस्वी द्वारा नीतीश को “अचेत मुख्यमंत्री” कहना उल्टा पड़ा। नीतीश ने 25 दिनों में 181 सभाएँ कर यह संदेश दिया कि वे सक्रिय हैं।
बड़े वादे अव्यवहारिक साबित हुए
महागठबंधन ने अपने घोषणापत्र में कई बड़े वादे किए—
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हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी
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माई बहिन योजना के तहत महिलाओं को 30,000 रुपये
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500 रुपये में गैस सिलेंडर
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25 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज
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भूमिहीन परिवारों को जमीन
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200 यूनिट मुफ्त बिजली

लेकिन सबसे बड़ा सवाल “हर परिवार को एक नौकरी” के वादे पर उठा। जाति सर्वे के अनुसार बिहार में कुल 2.83 करोड़ परिवार हैं। सरकारी नौकरियां मात्र 20 लाख लोग कर रहे हैं और खाली पद केवल 3 लाख हैं।
ऐसे में 2.63 करोड़ परिवारों को नौकरी देना व्यावहारिक रूप से असंभव दिखाई दिया। यही कारण रहा कि मतदाता इसे गंभीरता से नहीं ले पाए।





