नई दिल्ली : डॉलर के मुकाबले रुपया ऑल टाइम लो आज फिर टूट गया। 4 दिसंबर को भारतीय मुद्रा 28 पैसे गिरकर 90.43 पर बंद हुई। लगातार दूसरे दिन रिकॉर्ड गिरावट ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है। 2025 में अब तक रुपया 5.5% कमजोर हो चुका है, जो अर्थव्यवस्था पर दबाव का संकेत है। इस शुरुआती स्तर पर ही रुपया ऑल टाइम लो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि विदेशी निवेश, अमेरिकी नीतियां और कमज़ोर ट्रेड बैलेंस मिलकर भारतीय करेंसी को गहरा चोट पहुँचा रहे हैं।

रुपया ऑल टाइम लो का आयात और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर
जब रुपया कमजोर होता है, तो देश का आयात महंगा हो जाता है। तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी—हर चीज़ की कीमत बढ़ती है। रुपया ऑल टाइम लो के कारण विदेश में पढ़ाई, घूमने, शॉपिंग और अन्य खर्च भी महंगे हो जाते हैं। यदि पहले 50 रुपये में 1 डॉलर मिलता था, तो अब 90 रुपये से अधिक देना पड़ता है। यानी स्टूडेंट्स की फीस, रेंट, खाने से लेकर ट्रैवल—हर चीज़ पर बड़ा असर पड़ेगा।

रुपया ऑल टाइम लो के 3 मुख्य कारण
1. अमेरिकी आयात टैरिफ और व्यापारिक तनाव
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारतीय आयात पर 50% तक टैरिफ लगा दिया है। इससे भारत की GDP ग्रोथ 60–80 बेसिस पॉइंट तक गिर सकती है। निर्यात घटने से विदेशी मुद्रा कम हो रही है, जो रुपया ऑल टाइम लो की ओर धकेल रही है।
2. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की भारी बिकवाली
जुलाई 2025 के बाद से FIIs ने 1.03 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री की है। डॉलर कन्वर्जन बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ी और रुपए पर दबाव आया। यह स्थिति सीधे रुपया ऑल टाइम लो को गहरा बना रही है।
3. क्रूड और गोल्ड कंपनियों द्वारा हेजिंग
तेल और सोना कंपनियां भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए डॉलर खरीद रही हैं। आयातक भी स्टॉक कर रहे हैं। इससे बाजार में डॉलर की डिमांड और बढ़ गई है और रुपया टूटता गया।
RBI का सीमित हस्तक्षेप और बाजार की उम्मीदें
LKP सिक्योरिटीज के अनुसार RBI ने इस बार मुद्रा बाजार में बहुत कम दखल दिया है। यही वजह है कि रुपया ऑल टाइम लो लगातार गहरा होता गया। मेटल और गोल्ड की कीमतें बढ़ने से आयात बिल और बढ़ गया।
शुक्रवार को आने वाली RBI पॉलिसी से उम्मीद है कि सेंट्रल बैंक मुद्रा को स्थिर करने के लिए सख्त कदम उठा सकता है। अभी रुपया तकनीकी रूप से ओवरसोल्ड है, इसलिए रिकवरी की गुंजाइश है।
करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
किसी भी करेंसी की वैल्यू उसके फॉरेन रिजर्व, आयात-निर्यात संतुलन और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जब भारत के पास डॉलर रिजर्व कम होता है, तो रुपया ऑल टाइम लो जैसी स्थिति बनती है। अधिक रिजर्व होने पर मुद्रा मजबूत रहती है।
डॉलर के मुकाबले किसी भी करेंसी के कमजोर होने को ‘डेप्रिसिएशन’ कहते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, घरेलू महंगाई और निवेशकों के विश्वास पर बड़ा प्रभाव डालता है।

सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें
रुपये-डॉलर से जुड़ी हर बड़ी आर्थिक अपडेट, मार्केट मूवमेंट और देश-दुनिया की ताज़ा खबरों के लिए हमारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ज़रूर फॉलो करें।
👉 Instagram:
https://instagram.com/enewsbharat
👉 Facebook:
https://facebook.com/enewsbharat
👉 X (Twitter):
https://x.com/eNewsRajasthan
👉 YouTube (Subscribe):
https://youtube.com/@enewsbharat
यहां आपको मिलेंगे – लाइव अपडेट्स, ब्रेकिंग न्यूज़, शॉर्ट वीडियो, एक्सक्लूसिव रिपोर्ट्स, मैच प्रीव्यू और रिव्यू
eNewsBharat के साथ जुड़े रहें
देश–विदेश की अर्थव्यवस्था, मार्केट मूवमेंट, रुपये–डॉलर अपडेट और सभी बड़ी घटनाओं की पल–पल की खबरों के लिए eNewsBharat
को विज़िट करते रहें। आपका भरोसा हमारी ताकत है—हम आगे भी आपको सबसे तेज़, सटीक और विश्वसनीय खबरें पहुँचाते रहेंगे।





