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बिहार चुनाव 2025: लालू यादव की सियासी यात्रा — सिपाही से मुख्यमंत्री तक का सफर

लालू प्रसाद यादव का जन्म बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में 1948 में एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन में उनका सपना बस सरकारी नौकरी पाना था। छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद लालू का मन पुलिस की वर्दी पहनने में लगा रहा। उन्होंने बिहार पुलिस में कांस्टेबल बनने की तैयारी की और पुलिस भर्ती परीक्षा में शामिल हुए। हालांकि, भाग्य ने उन्हें राजनीति की राह पर खींच लिया।

 

राजनीतिक दुनिया में कदम — नरेंद्र सिंह का योगदान

लालू यादव के छात्र जीवन के दौरान सोशलिस्ट नेता श्रीकृष्ण सिंह के बेटे, नरेंद्र सिंह ने उन्हें राजनीति की दिशा दी। उन्होंने लालू को सोशलिस्ट पार्टी की छात्र शाखा में नियुक्त किया। बीएन कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान लालू की भीड़ जुटाने और लोगों को समझाने की कला ने उन्हें जल्दी ही नेतृत्व क्षमता दी। हालांकि, उस दिन लालू सभा में शामिल होने की बजाय पुलिस भर्ती परीक्षा देने चले गए।

 

लोकसभा और बिहार विधानसभा तक का सफर

1977 में मात्र 29 वर्ष की उम्र में लालू यादव जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा सांसद बने। इसके बाद 1980 और 1985 में बिहार विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1989 में उन्हें विपक्ष का नेता बनाया गया और 1990 में उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव दलितों, पिछड़ों और गरीबों की आवाज़ बन गए।

 

सियासी अनोखी शैली और जनता से जुड़ाव

लालू यादव की राजनीति का सबसे बड़ा आकर्षण उनकी बेबाक शैली, हास्य और संवाद कौशल था। उन्होंने पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की पैरवी की और बिहार की राजनीतिक और सामाजिक संरचना को बदलने का प्रयास किया। जनता में उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।

 

विवाद और चुनौती — चारा घोटाला

लालू यादव के करियर में विवाद भी आए। सबसे प्रमुख था चारा घोटाला, जिसमें उन्हें सजा भी हुई। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव पर कोई असर नहीं पड़ा। लालू ने अपने आलोचकों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी बेबाक अंदाज में जवाब दिया।

 

अनजानी घटनाएं और किस्से

मुख्यमंत्री रहते हुए लालू यादव ने कई चौंकाने वाले फैसले लिए। एक बार उन्होंने अपने गुरु कर्पूरी ठाकुर को जीप देने से मना कर दिया। इसी तरह मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के साथ उनका विवाद भी चर्चा में रहा, जहां उन्होंने शेषन को ‘पागल सांड’ कहकर संबोधित किया। ऐसे किस्से लालू की अनोखी सियासी शैली और जनता के साथ उनके जुड़ाव को दर्शाते हैं।

 

परिवार का राजनीतिक योगदान

लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी भी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। उनके परिवार का राजनीतिक प्रभाव और शक्ति बिहार की राजनीति में आज भी महत्वपूर्ण है। लालू और उनका परिवार पिछड़ों और गरीबों के हित में सियासी लड़ाई में लगातार सक्रिय रहे हैं।

साधारण ग्रामीण परिवार से निकलकर बिहार के मुख्यमंत्री और देश की राजनीति में एक बड़ा चेहरा बनने वाले लालू यादव का सफर प्रेरणादायक है। उनकी अनोखी शैली, जनता से जुड़ाव और पिछड़ों के हित में किए गए प्रयास उन्हें बिहार और भारत की राजनीति में एक अलग पहचान देते हैं। बिहार चुनाव 2025 में लालू यादव और उनके परिवार का प्रभाव आज भी व्यापक रूप से देखा जा रहा है।

 

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