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यूपी सरकार वापस ले रही है अखलाक हत्याकांड का केस, पीड़ितों की न्याय की आस कमज़ोर

उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रेटर नोएडा (दादरी) के बिसाहड़ा गांव में 2015 में हुई मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या (लिंचिंग) के मामले में एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज सभी मुकदमों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह निर्णय कानूनी और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर भारी विवाद पैदा कर रहा है।

 

क्या है मामला?

यह घटना 28 सितंबर 2015 की है, जब दादरी के बिसाहड़ा गांव में एक भीड़ ने अखलाक पर हमला किया और उन्हें पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। उनके बेटे दानिश को भी गंभीर चोटें आई थीं। पुलिस ने इसघटना के बाद एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें हत्या (IPC 302), जानलेवा हमला, दंगों और अन्य अपराध शामिल थे। अब, यूपी सरकार ने अदालत में एक आवेदन दायर किया है, जिसमें आरोपियों के खिलाफ चल रहे सभी मुकदमे वापस लेने की मांग की गई है। सरकार का यह कदम CrPC की धारा 321 के आधार पर किया जा रहा है, जो अभियोजन पक्ष को कोर्ट की अनुमति से मुकदमा वापस लेने की छूट देता है। सुारजपुर कोर्ट ने इस आवेदन पर 12 दिसंबर को सुनवाई तय की है।

 

सरकार की दलीलें और तर्क

सरकारी पक्ष का कहना है कि अखलाक परिवार के बयानों में “परिवर्तन” देखा गया है — उनके आरोपों में समय-समय पर बदलाव आए हैं। आवेदन में यह भी कहा गया है कि पीड़ित और आरोपियों के बीच कोई स्पष्ट शत्रुता (enimity) दर्ज नहीं है, और इस दृष्टिकोण से मुकदमे जारी रखने का कोई ठोस आधार नहीं बचा है। साथ ही, सरकार इस कदम को संविधान की “समानता का अधिकार” (right to equality) का हिस्सा बता रही है — यह तर्क देते हुए कि अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया कानूनन वैध है।

 

विरोध, आलोचना और चिंताएं

सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) ने सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि यह “घृणा अपराधों को राज्य की मंजूरी देने जैसा” हो सकता है। सीपीएम महासचिव M A बेबी ने आरोप लगाया है कि ऐसे निर्णय से दोषियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने का संदेश जाएगा। पीड़िता परिवार के वकील यूसुफ सैफी ने कहा है कि उन्हें अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं मिला है और वे न्यायालय में आगे की सुनवाई के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे। आलोचकों ने यह भी कहा है कि यह कदम न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता और न्याय मिलने की उम्मीद को कमजोर कर सकता है।

 

पीड़ितों की निष्क्रिय उम्मीद और भावी स्थिति

अखलाक की बेटी, शाइस्ता, पहले ही गवाह के रूप में पेश हो चुकी हैं, और उनकी गवाही अभी चल रही है। यदि कोर्ट सरकार के आवेदन को मंजूरी देती है, तो मुकदमा बंद हो सकता है, जिससे पीड़ित परिवार की कानूनी लड़ाई पूरी तरह समाप्त हो सकती है।दूसरी ओर, कोर्ट इस आवेदन को ठुकराने का भी विकल्प रखती है; तब मुकदमा जारी रहेगा और न्याय प्रक्रिया पूरी होगी।

 

क्यों है यह निर्णय विवादास्पद?

न्याय और जवाबदेही की भावना पर सवाललिंचिंग जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील अपराध में अभियोजन वापस लेना न्यायिक जवाबदेही की भावना को कमजोर कर सकता है।राजनीतिक संदेशऐसे कदम को कुछ लोग “राज्य की सहमति” जैसा देख रहे हैं — इससे अन्य ऐसे मामलों में दोषियों को यह उम्मीद हो सकती है कि वे पार्टियों या सरकार के साथ संबंधों की वजह से बच सकते हैं।न्याय व्यवस्था पर भरोसापीड़ितों और उनके परिवारों में यह डर हो सकता है कि न्याय तक पहुंचने की उनकी उम्मीदें कट सकती हैं।कानूनी प्रतिमानCrPC की धारा 321 का उपयोग करना कानूनी है, लेकिन यह-संवेदनशील मामलों में इसे कैसे लागू किया जाए, यह एक गहन बहस का विषय बन सकता है।

 

http://यूपी सरकार ने अखलाक लिंचिंग केस वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की

 

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