आज 17 नवंबर 2025, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है और इस दिन शुभ एवं अत्यंत फलदायी सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष का समय भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है और इस काल में की गई पूजा मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। आज सूर्योदय सुबह 06:45 पर और सूर्यास्त शाम 05:27 पर होगा। त्रयोदशी तिथि पूर्ण रात्रि तक बनी रहेगी, जिसके कारण व्रती पूरे विधि-विधान के साथ शाम प्रदोष काल में शिव पूजन करेंगे।
शुभ-अशुभ योग व नक्षत्र
आज के पंचांग के अनुसार प्रीति योग सुबह 07:23 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है। इसके बाद आयुष्मान योग प्रभावी रहेगा। चित्रा नक्षत्र प्रातः 05:01 बजे तक विद्यमान रहेगा। चित्रा नक्षत्र के जातकों को आज रचनात्मक कार्यों और मानसिक ऊर्जा में वृद्धि के योग बन रहे हैं। इस नक्षत्र के स्वामी मंगल तथा राशि स्वामी बुध और शुक्र होने से दिन संयम और उत्साह का संतुलन बनाए रखने का संकेत देता है।
सूर्य, चंद्र की स्थिति और वार का महत्व
आज सूर्य तुला राशि में स्थित रहेंगे, जो संतुलन, न्याय और सौम्यता का प्रतीक है। वहीं चंद्रोदय 18 नवंबर की सुबह 04:56 पर होगा और चंद्रास्त दोपहर 03:32 पर। सोमवार का दिन स्वयं शिवजी का माना जाता है, इसलिए जब त्रयोदशी सोमवार को पड़े तो वह सोम प्रदोष कहलाता है और इसका फल कई गुना अधिक मिलता है।
आज के शुभ मुहूर्त और अशुभ समय
अभिजीत मुहूर्त 11:45 से 12:27 बजे तक है, जो किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम है। वहीं अमृत काल रात 09:52 से 11:39 बजे तक बेहद लाभकारी रहेगा। राहुकाल सुबह 08:05 से 09:26 तक तथा यमगंड 10:46 से 12:06 तक रहेगा। इन कालों में महत्वपूर्ण कार्यों से बचना हितकारी होगा।
सोम प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से पाप नष्ट होते हैं, भय दूर होता है और मनुष्य को मानसिक शांति एवं समृद्धि प्राप्त होती है। शिवपुराण में उल्लेख मिलता है कि प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल, दूध, गंगाजल, बिल्वपत्र और धतूरा चढ़ाने से व्रती को विशेष पुण्य मिलता है। इस दिन “ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का जप अत्यंत फलदायी माना गया है।
सोम प्रदोष व्रत विधि
व्रती प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और दिनभर संयम, सात्त्विकता और श्रद्धा बनाए रखते हैं। शाम के समय पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। सूर्यास्त के बाद लगभग डेढ़ घंटे के भीतर प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। पूजा में जल, दूध, दही, शहद, गंगाजल और चंदन का प्रयोग शुभ माना गया है। इसके बाद बिल्वपत्र, पुष्प और धतूरा अर्पित कर शिव-पार्वती की आरती की जाती है। रात में प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन होता है।
दान-पुण्य और सेवा का महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि प्रदोष के दिन दान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। आज के दिन गौ-सेवा, अन्नदान और जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है।
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