इस्लामाबाद | पाकिस्तान ने चीन के अरुणाचल दावे का समर्थन करते हुए एक बार फिर भारत-विरोधी कूटनीति को हवा दी है। हालिया घटनाओं से अरुणाचल प्रदेश विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। 5 दिसंबर की प्रेस ब्रीफ़िंग में पाकिस्तान ने कहा कि चीन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर वह “हमेशा चीन के साथ खड़ा रहेगा।”

पाकिस्तान ने चीन के दावे का समर्थन क्यों किया
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा मानता है और पाकिस्तान इस दावे को स्वीकार करता है। उनका बयान चीन की विदेश मंत्रालय प्रवक्ता माओ निंग के उस पुराने बयान पर आधारित था जिसमें उन्होंने कहा था कि अरुणाचल भारत का नहीं बल्कि “जांगनान” यानी दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है।
भारत का सख्त जवाब
भारत ने इस बयान का तीखा विरोध किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दो टूक कहा— “अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। चीन चाहे जितना भी इनकार करे, सच्चाई नहीं बदल सकती।” भारत ने स्पष्ट किया कि कूटनीति और भू-राजनीति के खेल में तथ्यों से छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी।
चीन बार-बार अरुणाचल को अपना क्यों बताता है
चीन ऐतिहासिक दावों के आधार पर अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है। चीन का आरोप है कि भारत ने उसके क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, जबकि भारत हमेशा से इसे अपना अभिन्न राज्य घोषित करता आया है। 2015 में चीन के एक रिसर्चर झांग योंगपान ने कहा था कि “अरुणाचल के इलाके कई सौ सालों से चीन के नियंत्रण में रहे हैं,” हालांकि इतिहास और अंतरराष्ट्रीय मानकों में इस दावे का कोई पुख्ता आधार नहीं है।
अरुणाचल की महिला के साथ शंघाई एयरपोर्ट पर बदसलूकी
विवाद तब और गहरा गया जब अरुणाचल में जन्मी भारतीय महिला पेम वांगजॉम थांगडॉक के साथ शंघाई एयरपोर्ट पर चीनी अधिकारियों ने बदसलूकी की। उनका पासपोर्ट “इनवैलिड” बताकर 18 घंटे रोका गया। अधिकारियों ने कहा— “अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है, तुम्हें चीनी पासपोर्ट लेना चाहिए।” भारत ने इस घटना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया था, इसे नागरिकों का अपमान और भारत की संप्रभुता पर हमला बताया था।
अरुणाचल प्रदेश का रणनीतिक महत्व
पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर भारत का सुरक्षा कवच माना जाता है। यह राज्य तिब्बत, भूटान और म्यांमार से सीमा साझा करता है। चीन की मुख्य रुचि तवांग जिले में है, जो धार्मिक और सामरिक दोनों ही दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चीन द्वारा जगहों के नाम बदलने का इतिहास
चीन पिछले 8 सालों में अरुणाचल प्रदेश की लगभग 90 जगहों के नाम बदल चुका है।
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मई 2024 में 27 जगहों के नाम बदले गए।
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2023 में 11 नाम बदले गए।
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2021 में 15 नाम।
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2017 में 6 नाम।
भारत ने इन कार्रवाइयों को “निरर्थक, हास्यास्पद और चीन की मनगढंत रणनीति” बताया है।

क्या नाम बदलने से सच्चाई बदल जाएगी?
इसका जवाब भारत ने कई बार दिया है— नहीं। नाम बदलने से न तो सीमाएं बदलती हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्य। अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसी मान्यता को स्वीकार करता है।
अंतरराष्ट्रीय नियम क्या कहते हैं
किसी भी देश द्वारा किसी क्षेत्र का नाम बदलने के लिए UN Global Geographic Information Management की मंजूरी आवश्यक है। इसमें विशेषज्ञ जांच, स्थानीय जनसंख्या से बातचीत, और ऐतिहासिक प्रमाणों की जांच शामिल होती है। चीन बिना इन प्रक्रियाओं के अपने मन से नाम बदलता रहता है, जिसका अंतरराष्ट्रीय तौर पर कोई असर नहीं होता।
अरुणाचल प्रदेश विवाद सिर्फ सीमा विवाद नहीं, बल्कि भू-राजनीति, रणनीतिक स्वार्थ, मनोवैज्ञानिक दबाव और कूटनीतिक खेल का हिस्सा है। भारत बार-बार यह स्पष्ट कर चुका है कि अरुणाचल प्रदेश सदैव भारत का हिस्सा रहा है और रहेगा—किसी देश का दावा या नाम बदलने की कोशिश इस सच्चाई को कभी नहीं बदल सकती।
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