दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के छात्रसंघ चुनाव 2025 में एक बार फिर लेफ्ट यूनिटी ने अपना दबदबा कायम रखा है। अध्यक्ष से लेकर संयुक्त सचिव तक, चारों पदों पर लेफ्ट समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।ओएन शुक्ला, अदिति मिश्रा, शिवम कुमार और तनुजा सेन ने क्रमशः चारों प्रमुख पदों पर कब्जा किया।यह लगातार तीसरा मौका है जब लेफ्ट यूनिटी ने JNU की सत्ता पर कब्जा जमाया है। सवाल अब यह है कि आखिर JNU में लेफ्ट का किला दरकता क्यों नहीं?
विचारधारा और ग्राउंड कनेक्शन बना ताकत
JNU की राजनीति का सबसे मजबूत आधार हमेशा से उसकी विचारधारा रही है। लेफ्ट यूनिटी (AISA, SFI, AISF और DSF) का गठबंधन न केवल संगठित है, बल्कि विचार और संवाद की राजनीति को आगे रखता है।यह संगठन छात्रों के मुद्दों—जैसे फीस वृद्धि, लैंगिक समानता, और शिक्षा में अवसर की समानता—पर लगातार सक्रिय रहते हैं। यही जुड़ाव उन्हें हर साल नई पीढ़ी के छात्रों से जोड़ता है।
लेफ्ट यूनिटी का फॉर्मूला: एकता और रणनीति
JNU में लेफ्ट की मजबूती का सबसे बड़ा कारण है उनका एकजुट चुनावी फॉर्मूला। जहां ABVP या NSUI जैसे संगठन अक्सर आपसी मतभेदों से जूझते हैं, वहीं लेफ्ट यूनिटी संयुक्त मोर्चे के रूप में उतरती है।इस बार भी उन्होंने मुद्दों पर आधारित कैंपेन चलाया — “Education Not Exclusion” और “Campus for All” जैसे नारे छात्रों के बीच गूंजे।
अदिति मिश्रा और ओएन शुक्ला का उभार
अदिति मिश्रा, जो JNU के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज से आती हैं, ने महिला सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को प्रमुखता दी।वहीं ओएन शुक्ला ने छात्र-कल्याण, स्कॉलरशिप और कैंपस रोजगार जैसे ठोस मुद्दों पर फोकस किया।इन दोनों उम्मीदवारों ने अपने सहज व्यवहार और एक्टिव कैंपेनिंग से छात्रों के बीच विश्वास कायम किया।
ABVP और NSUI क्यों पिछड़े?
इस बार ABVP और NSUI ने भी बड़े स्तर पर कैंपेन चलाया, लेकिन छात्रों के बीच लेफ्ट यूनिटी की पकड़ ढीली नहीं पड़ी।ABVP ने राष्ट्रीयता और विकास को मुद्दा बनाया, जबकि NSUI ने रोजगार और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बात की।फिर भी, दोनों संगठन छात्रों के रोजमर्रा के कैंपस इश्यू से उतना जुड़ नहीं पाए जितना लेफ्ट समूह जुड़ा रहा।
जेएनयू में लेफ्ट का किला क्यों अडिग है?
छात्रों के स्थानीय और बुनियादी मुद्दों पर मजबूत पकड़एकजुट संगठन और स्पष्ट विचारधारासामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और लोकतांत्रिक बहस पर फोकसलगातार ग्राउंड एक्टिविज़्म और संवाद इन चार कारणों ने जेएनयू में लेफ्ट का किला आज तक अडिग रखा है।
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