अलवर_शहर की कृष वाटिका में इस वर्ष छठ पूजा का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ घाट पर उमड़ पड़ी। सभी ने परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार छठ माता की पूजा-अर्चना की और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। वातावरण “जय छठी मइया” के जयघोष से गूंज उठा।
इस धार्मिक अवसर पर भारत विकास परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण सदस्य श्री संजीव अग्रवाल विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने छठ माता की आराधना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा —“हम पूजा में जिन फलों का उपयोग करते हैं, उनके बीज अगर हम कचरे में फेंकने की बजाय भूमि में बो दें, तो ये बीज पेड़ बन सकते हैं और वातावरण को स्वच्छ रख सकते हैं।”अग्रवाल ने बताया कि यह एक छोटा लेकिन प्रभावशाली कदम है, जिससे समाज में हर व्यक्ति पर्यावरण सुधार में भागीदारी निभा सकता है।
बीज बोने का अनोखा अभियान
श्री अग्रवाल ने कहा कि भारत विकास परिषद का मुख्य उद्देश्य समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अपील की कि वे पूजा में प्रयुक्त फलों जैसे सेब, अमरूद, नींबू, बेल या आम के बीजों को एकत्रित कर पास के पार्क, खेत या बगीचे में बोएं।यह कदम न केवल वृक्षारोपण को बढ़ावा देगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी स्वच्छ और हरित वातावरण देगा।
छठ पूजा की आध्यात्मिक महिमा
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मइया को समर्पित त्योहार है। यह पर्व उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। कृष वाटिका में आयोजित इस आयोजन में भक्तों ने व्रत रखकर, सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।महिलाओं ने पारंपरिक गीतों पर पूजा की रस्में निभाईं और श्रद्धालुओं ने मिलकर “उदीयमान सूर्य” को अर्घ्य देकर पर्व का समापन किया।
स्थानीय लोगों ने सराहा पहल
कृष वाटिका में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संजीव अग्रवाल की पहल की प्रशंसा की। कई लोगों ने मौके पर ही फलों के बीज इकट्ठे किए और उन्हें नजदीकी पार्क में बोने का संकल्प लिया। लोगों ने कहा कि यह त्योहार न केवल धार्मिक भावनाओं का प्रतीक है, बल्कि समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश भी देता है।कृष वाटिका में मनाई गई छठ पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि इसने पर्यावरण संरक्षण का एक सुंदर संदेश भी दिया। भारत विकास परिषद और श्रद्धालुओं के इस प्रयास से यह स्पष्ट है कि जब धर्म और पर्यावरण एक साथ चलते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित होता है।
संवाददाता_मुकेश कुमार शर्मा
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