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रुपया ऑल टाइम लो

रुपया ऑल टाइम लो: डॉलर के मुकाबले 90.47 पर पहुँचा, विदेशी फंड निकासी से भारतीय करेंसी पर बढ़ा दबाव pressure

रुपया ऑल टाइम लो पर पहुँच चुका है और इस समय भारतीय करेंसी डॉलर के मुकाबले 90.47 के सबसे निचले स्तर पर है। 4 दिसंबर को भी रुपए ने 90.43 का रिकॉर्ड लो बनाया था, लेकिन 11 दिसंबर को यह स्तर टूट गया। लगातार विदेशी फंड्स की भारी बिकवाली और कमजोर वैश्विक संकेतों के कारण रुपया ऑल टाइम लो पर फिसलता जा रहा है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर सीधा असर दिखने लगा है।

 

रुपए के 90.47 पहुँचने के पीछे मुख्य वजहें

रुपया ऑल टाइम लो बनने के पीछे तीन प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं—विदेशी फंड्स की निकासी, अमेरिका की ओर से भारतीय आयात पर भारी टैरिफ और आयातकों का डॉलर खरीदना। 2025 में अब तक रुपया 5% से ज्यादा टूट चुका है। वर्ष की शुरुआत में 85.70 के मुकाबले अब यह सीधे 90.47 के स्तर पर आ गया है, जो करेंसी की गंभीर कमजोरी को दिखाता है।

 

रुपए की गिरावट से आम लोगों पर असर

रुपया ऑल टाइम लो का सबसे बड़ा असर सीधे आम लोगों पर पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो अमरीका और अन्य देशों से चीजें इम्पोर्ट करना महंगा हो जाता है। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, कारें, पेट्रोलियम उत्पाद और गोल्ड की कीमतों पर बोझ बढ़ जाता है। विदेश घूमने और विदेश में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों के खर्च भी लगभग दोगुने हो रहे हैं। पहले जहाँ 50 रुपए में 1 डॉलर मिलता था, आज उसकी कीमत 90 रुपए से ऊपर पहुँच चुकी है।

 

रुपया ऑल टाइम लो

FII निकासी और डॉलर डिमांड का प्रभाव

विदेशी निवेशकों द्वारा की जा रही बड़े पैमाने की बिकवाली भी रुपया ऑल टाइम लो के पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण कारण है। जुलाई 2025 से अब तक FIIs ₹1.55 लाख करोड़ से अधिक के भारतीय एसेट्स बेच चुके हैं। FIIs अपने निवेश को डॉलर में कन्वर्ट करते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर पड़ जाता है।

 

अमेरिकी टैरिफ का भारत की करेंसी पर सीधा असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय आयात पर 50% टैरिफ लगाने के फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की GDP 60–80 बेसिस पॉइंट तक गिर सकती है। निर्यात में कमी और फॉरेन एक्सचेंज इनफ्लो में गिरावट के कारण रुपया ऑल टाइम लो पर पहुँच गया है। यह भारत-अमेरिका ट्रेड रिलेशनशिप को भी प्रभावित कर रहा है।

 

RBI का कम हस्तक्षेप और बाज़ार की चिंता

LKP सिक्योरिटीज के रिसर्च एनालिस्ट जतिन त्रिवेदी का कहना है कि RBI ने इस बार करेंसी को सपोर्ट करने के लिए अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप किया, जिससे रुपया तेजी से गिरा। मेटल और गोल्ड की रिकॉर्ड ऊँची कीमतों ने आयात का बिल और बढ़ा दिया है। भारत-अमेरिका ट्रेड डील की अनिश्चितता भी बाज़ार में चिंता बढ़ा रही है। शुक्रवार को आने वाली RBI पॉलिसी से उम्मीद है कि सेंट्रल बैंक कुछ स्थिरता लाने वाले कदम उठा सकता है।

 

करेंसी की वैल्यू कैसे तय होती है?

किसी देश की मुद्रा की वैल्यू उसके फॉरेन रिजर्व और डॉलर की उपलब्धता से तय होती है। जब डॉलर की तुलना में स्थानीय करेंसी की कीमत घटती है, तो इसे करेंसी डेप्रिसिएशन कहते हैं। यदि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटता है तो रुपया कमजोर होता है और बढ़ने पर मजबूत। अभी भारत के फॉरेक्स रिजर्व पर भी दबाव बना हुआ है, जो रुपया ऑल टाइम लो की एक और वजह है।

(External DoFollow Source: PIB – https://pib.gov.in)

आगे क्या हो सकता है? विशेषज्ञों की राय

तकनीकी रूप से रुपया ओवरसोल्ड ज़ोन में माना जा रहा है। यदि RBI हस्तक्षेप बढ़ाता है और ट्रेड डील पर सकारात्मक संकेत आते हैं, तो रुपए में कुछ रिकवरी संभव है। लेकिन यदि FII निकासी जारी रही और अमेरिकी टैरिफ में राहत नहीं मिली, तो रुपया ऑल टाइम लो का स्तर और नीचे जा सकता है। भारतीय निवेशकों को फिलहाल मजबूत आर्थिक संकेतों का इंतजार करना होगा।

(Internal Link: https://enewsbharat.news/business)

 

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