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चावल एक्सपोर्ट

चावल एक्सपोर्ट पर संकट: USA–ईरान तनाव से थमा निर्यात, गिरते दामों ने किसान से मिलर्स तक बढ़ाई चिंता

कोटा, संवाददाता: तेजपाल सिंह बग्गा

 

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को झकझोर दिया है, जिसका सीधा असर भारत के चावल निर्यात पर पड़ा है। खासतौर पर खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात रुकने से चावल एक्सपोर्ट पर संकट गहराता जा रहा है। यह संकट केवल कागजों तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर किसान, व्यापारी, मिलर्स और एक्सपोर्टर सभी को प्रभावित कर रहा है।

 

हाड़ौती संभाग में चावल उत्पादन और निर्यात की अहम भूमिका 

राजस्थान का हाड़ौती संभाग और उससे सटा मध्य प्रदेश क्षेत्र चावल उत्पादन में अग्रणी माना जाता है। कोटा संभाग की कृषि मंडियों में बड़ी मात्रा में धान की आवक होती है। यहीं से चावल की प्रोसेसिंग होकर सेला और अन्य किस्मों का निर्माण होता है, जो आगे खाड़ी देशों में निर्यात किए जाते हैं। ऐसे में चावल एक्सपोर्ट पर संकट इस पूरे क्षेत्र की आर्थिक सेहत को प्रभावित कर रहा है।

 

USA–ईरान तनाव का सीधा असर चावल एक्सपोर्ट पर संकट के रूप में 

वर्तमान समय में अमेरिका और ईरान के रिश्तों में आई खटास, संभावित युद्ध जैसे हालात और ईरान में अंदरूनी विरोध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। नतीजतन, खाड़ी देशों में चावल की मांग अस्थिर हो गई है, जिससे चावल एक्सपोर्ट पर संकट और गहरा गया है।

 

चावल के दाम गिरे: 70 से 65 रुपये प्रति किलो तक फिसलन 

एक्सपोर्टर नीलेश पटेल के अनुसार, चावल के निर्यात मूल्य में करीब 5 रुपये प्रति किलो की गिरावट आई है। जहां पहले चावल 70 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा था, वहीं अब दाम 65 रुपये के आसपास सिमट गए हैं। यह गिरावट चावल एक्सपोर्ट पर संकट का सबसे प्रत्यक्ष संकेत मानी जा रही है।

 

किसानों की स्थिति: फसल बिक चुकी, लेकिन लाभ अधूरा 

भामाशाह कृषि उपज मंडी के बड़े व्यापारी प्रकाशचंद जैन पालीवाल बताते हैं कि किसान अपनी करीब 80 फीसदी धान की फसल पहले ही बेच चुके हैं। केवल 20 फीसदी माल किसानों के पास बचा है। हालांकि, दाम बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन चावल एक्सपोर्ट पर संकट के कारण किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।

 

मिलर्स और एक्सपोर्टर की दुविधा: सौदे रुके, माल अटका 

कोटा के इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित विपिन इंडस्ट्रीज राइस मिल के संचालक मनोज जैन का कहना है कि तैयार माल होने के बावजूद निर्यात नहीं हो पा रहा। मिलर्स ने अभी केवल जून–जुलाई तक का ही धान खरीदा है, जबकि मिलें अगस्त–सितंबर तक चलती हैं। चावल एक्सपोर्ट पर संकट के चलते आगे के सौदे ठप हैं, इसलिए मिलर्स भी खरीदारी से बच रहे हैं।

 

मंडी बाजार में स्थिरता या मंदी: आगे क्या संकेत 

बीते 15 दिनों से बाजार में स्थिरता बनी हुई है। धान के भाव जस के तस हैं, जबकि इस समय दाम बढ़ने चाहिए थे। यदि ईरान का मामला और बिगड़ता है, तो भविष्य में मंदी के आसार और प्रबल हो सकते हैं। यह स्थिति चावल एक्सपोर्ट पर संकट को लंबे समय तक खींच सकती है।

 

आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से चावल एक्सपोर्ट पर संकट 

भारत विश्व के प्रमुख चावल निर्यातक देशों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर केवल स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं रहता। चावल एक्सपोर्ट पर संकट विदेशी मुद्रा आय, रोजगार और कृषि आधारित उद्योगों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति के इस संबंध को समझना जरूरी है।

 

भविष्य की राह: समाधान और संभावनाएं 

विशेषज्ञों का मानना है कि वैकल्पिक बाजारों की खोज, घरेलू खपत को प्रोत्साहन और सरकारी स्तर पर निर्यात नीति में लचीलापन इस संकट से उबरने के उपाय हो सकते हैं। साथ ही, किसानों और मिलर्स को जोखिम प्रबंधन के नए तरीके अपनाने होंगे ताकि चावल एक्सपोर्ट पर संकट का प्रभाव कम किया जा सके।

 

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