वॉशिंगटन डीसी | ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा इस समय अमेरिका की इमिग्रेशन नीति का सबसे विवादित मुद्दा बन गया है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने इस नए वीजा प्रोग्राम के तहत आवेदन करने वालों से 1 मिलियन डॉलर यानी लगभग ₹9 करोड़ की फीस तय की है। सरकार का कहना है कि यह योजना “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा है, लेकिन कई अमेरिकी राज्य इसे कानून और जनहित के खिलाफ मान रहे हैं।
ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा का उद्देश्य उच्च आय वाले, प्रतिभाशाली और निवेश करने में सक्षम विदेशी नागरिकों को अमेरिका में स्थायी निवास का अवसर देना है। हालांकि इतनी भारी फीस के कारण यह वीजा आम प्रोफेशनल्स की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, जिससे विवाद गहराता जा रहा है।

20 राज्यों ने क्यों किया कोर्ट में मुकदमा
कैलिफोर्निया के नेतृत्व में अमेरिका के 20 राज्यों ने ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया है। इन राज्यों में न्यूयॉर्क, इलिनॉय, वॉशिंगटन और मैसाचुसेट्स जैसे बड़े राज्य शामिल हैं। उनका कहना है कि यह फैसला न सिर्फ गैर-कानूनी है, बल्कि सार्वजनिक सेवाओं को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। राज्यों का तर्क है कि संसद की मंजूरी के बिना इतनी बड़ी फीस तय करना अमेरिकी कानूनों का उल्लंघन है। उनका दावा है कि इससे अमेरिका में जरूरी सेवाओं के लिए विदेशी टैलेंट आना लगभग असंभव हो जाएगा।

₹9 करोड़ फीस पर राज्यों की आपत्ति
राज्यों का कहना है कि पहले H-1B जैसे वीजा की फीस 1,000 से 7,500 डॉलर के बीच होती थी। अचानक इसे 1 मिलियन डॉलर तक बढ़ा देना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है। ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा की फीस वास्तविक प्रोसेसिंग लागत से सैकड़ों गुना ज्यादा बताई जा रही है। कैलिफोर्निया के अटॉर्नी जनरल रॉब बोंटा ने साफ कहा कि बिना सार्वजनिक चर्चा और नोटिस के इतना बड़ा बदलाव प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (APA) का उल्लंघन है।
डॉक्टरों और शिक्षकों की कमी कैसे बढ़ेगी
राज्यों के अनुसार ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा का सबसे बड़ा असर डॉक्टरों, नर्सों, शिक्षकों और वैज्ञानिकों पर पड़ेगा। स्कूलों, अस्पतालों और यूनिवर्सिटीज़ को पहले वीजा फीस में छूट मिलती थी, लेकिन अब एक विदेशी प्रोफेशनल को लाने में ₹9 करोड़ खर्च करने होंगे। इतनी बड़ी राशि खर्च करना सरकारी और गैर-लाभकारी संस्थानों के लिए लगभग असंभव है। इससे या तो सेवाएं घटेंगी या फिर दूसरे विकास कार्यों का बजट काटना पड़ेगा।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेक्टर पर असर
अमेरिकी शिक्षा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, देश के करीब 75% डिस्ट्रिक्ट स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। खासतौर पर साइंस, स्पेशल एजुकेशन और बाइलिंगुअल टीचर्स की भारी जरूरत है। ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा लागू होने से यह संकट और गहरा सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी हालात गंभीर हैं। 2036 तक अमेरिका में लगभग 86,000 डॉक्टरों की कमी होने का अनुमान है। ग्रामीण और गरीब इलाकों में यह समस्या पहले से ही विकराल है, और नया वीजा नियम हालात और बिगाड़ सकता है।
व्हाइट हाउस का पक्ष क्या है
व्हाइट हाउस का कहना है कि ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा नियम अमेरिकियों की नौकरियों और वेतन की रक्षा के लिए बनाया गया है। प्रशासन का दावा है कि इससे वीजा प्रोग्राम के दुरुपयोग पर रोक लगेगी। हालांकि आलोचकों का मानना है कि यह नीति अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगी और अमेरिका की ग्लोबल टैलेंट हब वाली छवि को कमजोर करेगी।
भारत समेत विदेशी प्रोफेशनल्स पर प्रभाव
एक्सपर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा का सबसे ज्यादा असर भारत जैसे देशों से आने वाले प्रोफेशनल्स पर पड़ेगा। अमेरिका में काम करने वाले 70% से ज्यादा विदेशी प्रोफेशनल्स भारत, चीन और अन्य एशियाई देशों से आते हैं। इतनी ऊंची फीस के कारण कई टैलेंटेड लोग कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या यूरोप जैसे विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे अमेरिका को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।
गोल्ड कार्ड बनाम पुराने वीजा सिस्टम
कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक के अनुसार ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा, EB-1 और EB-2 जैसे पुराने ग्रीन कार्ड सिस्टम की जगह ले सकता है। इससे स्थायी निवास पाने की प्रक्रिया पूरी तरह बदल जाएगी। गोल्ड कार्ड के तहत अनलिमिटेड रेजिडेंसी मिलेगी, लेकिन नागरिकता और वोट देने का अधिकार नहीं होगा। यह बदलाव अमेरिकी इमिग्रेशन इतिहास में बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

आगे क्या हो सकता है
अब सबकी नजर कोर्ट के फैसले पर है। अगर राज्यों की दलीलें मान ली जाती हैं तो ट्रम्प गोल्ड कार्ड वीजा नीति में बदलाव या पूरी तरह रद्द होने की संभावना है। इस विवाद ने यह साफ कर दिया है कि इमिग्रेशन नीति सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से भी सीधे जुड़ी है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा अमेरिका की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।
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