भारत ने अमेरिका के नए रूसी प्रतिबंधों के बाद रूस से कच्चे तेल का आयात कम करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। न्यूज एजेंसी PTI के अनुसार, केंद्र सरकार ने यह फैसला 21 नवंबर से लागू होने वाले अमेरिकी प्रतिबंधों के मद्देनजर लिया है। इन प्रतिबंधों के तहत रूस की सरकारी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट (Rosneft) और लुकोइल (Lukoil) के साथ किसी भी प्रकार के लेन-देन पर रोक लगा दी गई है।
रिलायंस और एमआरपीएल घटाएंगे रूस से तेल खरीद
डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर (Kpler) के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिबंधों के असर से भारत की प्रमुख तेल रिफाइनर कंपनियां अब रूसी तेल की खरीद घटा रही हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने घोषणा की है कि वह रूस की सरकारी कंपनी रोसनेफ्ट से तेल खरीद बंद करेगी। वहीं मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) भी आयात में कटौती करेगी। इसके अलावा, एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड (HMEL) पहले ही रूसी तेल की खरीद रोक चुकी है। इन तीनों कंपनियों की हिस्सेदारी भारत के कुल रूसी तेल आयात में 50% से अधिक रही है।

दिसंबर से रूसी तेल आयात में तेज गिरावट की उम्मीद
केप्लर के लीड एनालिस्ट सुमित रतोलिया के अनुसार, “अधिकांश भारतीय रिफाइनर अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करेंगे और दिसंबर से रूस से तेल की खरीद में तेज गिरावट दिखेगी। 2026 की शुरुआत तक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार संभव है।” हालांकि, अक्टूबर महीने में भारत का रूसी तेल आयात 2.5% बढ़ा, लेकिन नवंबर और दिसंबर में इसमें बड़ी गिरावट की संभावना जताई जा रही है।
अमेरिकी सैंक्शंस का असर 21 नवंबर से
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने सभी वैश्विक कंपनियों को 21 नवंबर 2025 तक का समय दिया है, ताकि वे रोसनेफ्ट और लुकोइल के साथ अपने लेन-देन समाप्त कर सकें। अगर कंपनियां इन आदेशों का पालन नहीं करती हैं, तो उन पर भारी जुर्माना, ब्लैकलिस्टिंग या व्यापार प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अमेरिकी संस्थाओं को भी इन रूसी कंपनियों के साथ किसी भी तरह का व्यापार करने से पूरी तरह रोका गया है।
महंगे तेल से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की आशंका
रूसी तेल की सबसे बड़ी खासियत उसका कम दाम था। अब भारत को तेल खरीद के लिए मध्य पूर्व या अमेरिका की ओर रुख करना पड़ेगा, जहां तेल महंगा है। इससे रिफाइनिंग कॉस्ट बढ़ेगी और आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और दीर्घकालिक अनुबंधों पर ध्यान देना होगा।

रूस-यूक्रेन जंग के बाद से बढ़ा था भारत का रूसी तेल आयात
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूसी तेल सस्ते दामों पर बेचा जा रहा था। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, ने इसका लाभ उठाया और बड़ी मात्रा में डिस्काउंटेड रूसी क्रूड ऑयल खरीदा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अब तक लगभग 140 अरब डॉलर मूल्य का रूसी तेल खरीदा है, जिसे रिलायंस और अन्य कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल में प्रोसेस करके घरेलू और विदेशी बाजारों में बेचा।
ट्रम्प का बयान — “भारत साल के अंत तक रूसी तेल खरीद बंद करेगा”
व्हाइट हाउस में 22 अक्टूबर 2025 को पत्रकारों से बातचीत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा— “तेल खरीद को तुरंत रोकना संभव नहीं है, लेकिन साल के अंत तक भारत इसे पूरी तरह बंद कर देगा। मेरी प्रधानमंत्री मोदी से इस विषय पर चर्चा हुई है।”
भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया गया
अगस्त 2025 में, ट्रम्प प्रशासन ने रूस से तेल खरीद जारी रखने पर भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था। इस तरह भारत पर कुल 50% टैरिफ लागू है — जिसमें 25% रेसीप्रोकल टैरिफ और 25% पैनल्टी शामिल है। यह कदम अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह रूस की ऊर्जा आपूर्ति को वैश्विक स्तर पर सीमित करना चाहता है।
रूसी तेल पर निर्भरता घटाने का यह कदम भारत की ऊर्जा नीति और वैश्विक संबंधों दोनों के लिए अहम साबित होगा। हालांकि, इससे अल्पकाल में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में यह भारत को ऊर्जा विविधीकरण और रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएगा।





