बारां, संवाददाता: जयप्रकाश शर्मा
बारां ज़िले की मांगरोल सीमली पंचायत के सांकली गांव में मंगलवार को उस वक्त हड़कंप मच गया जब पूरे गांव ने मतदान का बहिष्कार कर दिया। गांव के 738 मतदाताओं में से केवल एक व्यक्ति ने ही अपना मत डाला। कारण था विकास कार्यों की लगातार अनदेखी और प्रशासन की उदासीनता।ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क, नाली, खरंजा, तालाब और मुक्तिधाम जैसी मूलभूत सुविधाओं की वर्षों से अनदेखी की जा रही है। बार-बार ज्ञापन देने के बावजूद केवल मौखिक आश्वासन ही मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ।
कलक्टर को मौके पर बुलाने पर अड़े ग्रामीण
जब मतदान शुरू हुआ, तो प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया। लेकिन ग्रामीणों की एक ही मांग थी — जिला कलक्टर खुद मौके पर आकर सुनवाई करें।हालांकि, आचार संहिता का हवाला देते हुए जिला कलक्टर मौके पर नहीं पहुंचे। इस पर नाराज ग्रामीणों के समर्थन में निर्दलीय प्रत्याशी नरेश मीणा खुद कीचड़ में धरने पर बैठ गए। करीब 15 मिनट इंतजार के बाद जब कलक्टर नहीं आए, तो मीणा वहां से रवाना हो गए।शाम करीब चार बजे जाकर सिर्फ एक मतदाता ने वोट डाला, जिससे यह गांव जिले में चर्चा का केंद्र बन गया।
गांव की जमीनी हकीकत – “कीचड़ में रास्ता, बिना नाली के गंदगी”
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में चारागाह भूमि पर अतिक्रमण, तालाब में जलकुंभी, और नालियों के अभाव में पूरे साल सड़कों पर गंदा पानी बहता है।सबसे बड़ी समस्या श्मशान घाट (मुक्तिधाम) तक जाने के रास्ते की है। एक किलोमीटर दूर स्थित इस स्थल तक जाने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है। बारिश के मौसम में अर्थी लेकर निकलना तक मुश्किल हो जाता है।श्मशान में टीनशेड तक नहीं है, जिससे बारिश में तिरपाल डालकर अंतिम संस्कार करना पड़ता है। ग्रामीणों ने बताया कि वे इस मुद्दे को लेकर कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों तक पहुंचे, लेकिन किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई
अधिकारियों के आश्वासन पर भी नहीं झुके ग्रामीण
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, मतदान बहिष्कार की सूचना पर एडीएम, नायब तहसीलदार और चुनाव अधिकारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों को मनाने की पूरी कोशिश की, यहां तक कि आवास और विकास कार्यों का भरोसा भी दिया गया।लेकिन ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा — “अब भरोसे नहीं, लिखित में वादा चाहिए।”उनका कहना था कि जब तक प्रशासन लिखित में विकास कार्य शुरू करने का आश्वासन नहीं देगा, वे मतदान नहीं करेंगे।
ग्रामीणों की चेतावनी पहले ही दी जा चुकी थी
सांकली के ग्रामीणों ने एक पखवाड़ा पहले बारा उपखंड अधिकारी को लिखित सूचना दी थी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे मतदान का बहिष्कार करेंगे।इसके बावजूद प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जिसके चलते मंगलवार को पूरा गांव मतदान केंद्र से दूर रहा।सांकली का यह मामला न केवल एक गांव की नाराजगी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि जब जनता की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो लोकतंत्र में ‘वोट’ किस मायने में इस्तेमाल होगा।ग्रामीणों के अनुसार, अब वे केवल आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहते हैं। और जब तक प्रशासनिक मशीनरी उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेती, सांकली जैसे गांवों में लोकतंत्र का उत्सव अधूरा ही रहेगा।
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