जोधपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने TSP एरिया नगर पालिका गठन को लेकर बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अनुसूचित (TSP) क्षेत्रों में नगर पालिकाओं का गठन संविधान के खिलाफ नहीं है, बशर्ते आदिवासी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
जोधपुर में सुनवाई करते हुए जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने उदयपुर और बांसवाड़ा जिले के TSP क्षेत्रों में नगर पालिकाओं के गठन को वैध ठहराया। इस फैसले से राज्य सरकार को आदिवासी बहुल इलाकों में शहरी विकास की बड़ी राहत मिली है।
क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंचा हाईकोर्ट
राज्य सरकार ने उदयपुर जिले के बलीचा, ऋषभदेव, सेमारी और बांसवाड़ा जिले के घाटोल, परतापुर सहित कई गांवों को नगर पालिका क्षेत्र में शामिल करने की अधिसूचना जारी की थी। इसके खिलाफ संबंधित ग्राम पंचायतों और आदिवासी प्रतिनिधियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये सभी गांव TSP एरिया में आते हैं और यहां नगर पालिका कानून लागू नहीं किया जा सकता। इसी विवाद को लेकर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें क्या थीं
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने संविधान के अनुच्छेद 243-ZC का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में म्युनिसिपैलिटी एक्ट अपने आप लागू नहीं होता। उन्होंने तर्क दिया कि जैसे ग्राम पंचायतों के लिए PESA Act है, वैसे ही नगर पालिकाओं के लिए संसद ने अब तक कोई MESA कानून नहीं बनाया है।
उनका दावा था कि बिना केंद्रीय कानून के TSP एरिया नगर पालिका गठन आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों का उल्लंघन करेगा और इससे उनकी जमीनें छीने जाने का खतरा बढ़ जाएगा।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिकाएं
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल किसी क्षेत्र के अनुसूचित होने से वहां विकास संबंधी सामान्य कानूनों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक राज्यपाल संविधान की 5वीं अनुसूची के तहत किसी कानून को विशेष रूप से प्रतिबंधित नहीं करते, तब तक राजस्थान म्युनिसिपैलिटी एक्ट, 2009 को TSP एरिया में लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि प्रशासनिक और शहरी विकास के लिए नगर पालिकाओं की आवश्यकता है और इसे पूरी तरह रोकना संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा।
TSP एरिया में क्या है ‘हाइब्रिड मॉडल’
चूंकि केंद्र सरकार ने अब तक MESA (Municipality Extension to Scheduled Area) कानून लागू नहीं किया है, इसलिए हाईकोर्ट ने एक संतुलित समाधान देते हुए हाइब्रिड मॉडल लागू करने का निर्देश दिया। इस हाइब्रिड मॉडल के तहत शहरी सुविधाओं जैसे सड़क, सफाई, रोशनी, भवन निर्माण और टैक्स व्यवस्था पर राजस्थान म्युनिसिपैलिटी एक्ट लागू होगा। वहीं आदिवासियों से जुड़े मूल अधिकार—जैसे जमीन, जंगल, संस्कृति और सामाजिक संरचना—पर संविधान की 5वीं अनुसूची और PESA एक्ट का संरक्षण बना रहेगा।
आदिवासी अधिकारों पर कोर्ट का स्पष्ट रुख
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि TSP एरिया में नगर पालिका बनने का मतलब यह नहीं है कि आदिवासियों के अधिकार खत्म हो जाएंगे। ग्राम सभाएं और PESA संस्थाएं समाप्त नहीं होंगी, बल्कि वे सलाहकार की भूमिका में बनी रहेंगी ताकि किसी भी निर्णय में आदिवासी हितों की अनदेखी न हो। कोर्ट ने कहा कि जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों का अधिकार सर्वोच्च रहेगा और कोई भी शहरी विकास इन अधिकारों को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
MESA कानून को लेकर केंद्र सरकार को निर्देश
हाईकोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि वर्ष 2001 से प्रस्तावित MESA बिल आज तक संसद में पारित नहीं हो पाया है। कोर्ट ने इसे “संवैधानिक शून्य” बताते हुए आदेश की प्रति केंद्र सरकार को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पालिकाओं के लिए स्पष्ट कानून बनाया जा सके। इससे भविष्य में TSP एरिया नगर पालिका गठन को लेकर होने वाले विवादों पर विराम लग सकेगा।
फैसले का राजस्थान पर क्या पड़ेगा असर
इस फैसले के बाद राजस्थान सरकार को आदिवासी बहुल इलाकों में शहरी विकास की नई दिशा मिलेगी। नगर पालिकाएं बनने से आधारभूत सुविधाओं में सुधार होगा और प्रशासनिक व्यवस्थाएं मजबूत होंगी। साथ ही हाईकोर्ट के हाइब्रिड मॉडल ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
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