टोंक, संवाददाता: केशव राज सैन
निर्वाचन आयोग की भूमिका पर गंभीर चिंता जताते हुए ऑल इंडिया कांग्रेस OBC लीडर एवं OBC एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य राजेन्द्र सेन ने कहा कि आज सवाल किसी पार्टी की जीत या हार का नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता का है। यदि जनता का भरोसा खत्म हुआ, तो लोकतंत्र भी कमजोर हो जाएगा।
लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग का महत्व
राजेन्द्र सेन के अनुसार किसी भी सच्चे लोकतंत्र में स्वतंत्र, निडर और गैर-पक्षपाती निर्वाचन आयोग के बिना निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। भारत की संवैधानिक व्यवस्था ने चुनाव आयोग को लोकतंत्र का संरक्षक बनाया था, लेकिन मौजूदा हालात में उसकी स्वायत्तता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
संविधान और अनुच्छेद 324 की भूमिका
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग को देता है। यही संवैधानिक शक्ति वर्षों तक आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता की गारंटी रही है।
निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया
पहले निर्वाचन आयोग एक-सदस्यीय संस्था थी, जिसका नेतृत्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त करते थे। बाद में इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया ताकि निर्णय सामूहिक हों। लेकिन आज नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के कारण निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का 2023 सुझाव
राजेन्द्र सेन ने बताया कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए। इस सुझाव का उद्देश्य निर्वाचन आयोग को राजनीतिक प्रभाव से बचाना था।
केंद्र सरकार का कानून और विवाद
सेन के अनुसार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह को दरकिनार करते हुए एक नया कानून बना दिया। इस कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह मंत्रिमंडल के एक सदस्य को समिति में शामिल किया गया, जिससे सत्ताधारी दल को सीधा लाभ मिला और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हुई।
आयुक्तों की स्वतंत्रता पर खतरा
नए कानून में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अन्य आयुक्तों को हटाने का अधिकार भी दे दिया गया। इससे आयुक्तों के बीच समानता खत्म हुई और उन पर सरकार के पक्ष में निर्णय लेने का दबाव बढ़ा।
अशोक लवासा प्रकरण का संदर्भ
पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा का उदाहरण देते हुए राजेन्द्र सेन ने कहा कि उन्होंने सत्ताधारी दल से असहमति जताने की हिम्मत दिखाई थी। इसके बाद उनके साथ जो हुआ, उसने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
आदर्श आचार संहिता पर आरोप
राजेन्द्र सेन ने कहा कि मौजूदा समय में आदर्श आचार संहिता का पालन चयनात्मक रूप से हो रहा है। विपक्ष पर सख्ती और सत्ताधारी दल को छूट मिलने से निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कमजोर हुआ है।
लोकतंत्र को कैसा निर्वाचन आयोग चाहिए
अंत में राजेन्द्र सेन ने सवाल उठाया—क्या हमें ऐसा निर्वाचन आयोग चाहिए जो केवल चुनाव कराए, या ऐसा जो लोकतंत्र की रक्षा भी करे? चुनावों की विश्वसनीयता और सभी प्रत्याशियों को समान अवसर देना ही किसी भी मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
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